शुक्रवार 24 जुलाई 2026 - 05:11
फ़ुजूलखर्ची के बाद धन-दौलत की दुआ क्यों क़बूल नहीं होती?

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नासिर रफ़ीई ने इस्लामी शिक्षाओं में आर्थिक व्यवस्था और वित्तीय अनुशासन के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि इस्लाम इंसान को अपनी संपत्ति की हिफ़ाज़त करने, फ़ुजूलखर्ची से बचने और रोज़ी कमाने के लिए मेहनत करने की शिक्षा देता है। केवल दुआ पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नासिर रफ़ीई ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की हदीसों के हवाले से कहा कि जो व्यक्ति अपनी दौलत को बेवजह खर्च करके बर्बाद कर देता है, उसके बारे में इमाम (अ) ने फ़रमाया कि ऐसे व्यक्ति में कोई भलाई नहीं है, क्योंकि वह अपने माल की हिफ़ाज़त नहीं करता।

उन्होंने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक व्यक्ति इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की सेवा में उपस्थित हुआ और अर्ज़ किया, "मेरे पास बहुत-सा धन था, लेकिन वह सब समाप्त हो गया। आप दुआ कीजिए कि अल्लाह मुझे फिर से दौलत अता फ़रमाए।"

इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमाया कि कुछ लोगों की दुआएँ क़बूल नहीं होतीं। उनमें एक वह व्यक्ति है जो फ़ुजूलखर्ची करके अपना धन बर्बाद कर दे और फिर अल्लाह से और अधिक धन की दुआ करे। अल्लाह तआला फ़रमाता है, "क्या मैंने तुम्हें फिजूलखर्ची से मना नहीं किया था? फिर तुमने मेरी हिदायत पर अमल क्यों नहीं किया?"

हुज्जतुल इस्लाम नासिर रफ़ीई ने आगे बताया कि इमाम (अ) के अनुसार दूसरा व्यक्ति वह है जो मेहनत और काम किए बिना केवल रोज़ी की दुआ करता रहता है, जबकि तीसरा वह है जो किसी को कर्ज़ देते समय कोई लिखित प्रमाण या दस्तावेज़ नहीं लेता और बाद में अपने नुकसान पर पछताता है।

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस्लामी शिक्षाएँ इंसान को दुआ के साथ-साथ सही योजना, मेहनत, मितव्ययिता और आर्थिक मामलों में सावधानी बरतने की भी शिक्षा देती हैं।

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